उत्तराखंडमनोरंजन

*हो लाख दुःख, पर नीच का एहसान लेना पाप है!*

*स्वरचित कविता*

यह सोचकर गृह दीप ने उजियार को लौटा जब दिया। जीबी
मांगी श्री तो श्राप मिला, जो भी मिला सो ठीक है!
श्रम की अगोचर राह पर तम की पुरानी लीग है!
अपने पराये हैं बहुत, मैं हाथ किसका थामता?
दोस्तों के दर्द ही मेरे सबसे अधिक नजदीक हैं!
दया के भेष में जब प्यार दिल के द्वार पर आया।
तब स्वाभिमानी पीर ने उस प्यार को लौटा दिया!
यह सोचकर गृह दीप ने उजियार को लौटा दिया।
मजबूर करता है अहम्, तो गीत लिखती है कलम!
जो भी मिला इस संसार से सब उसे ही लौटा दिया।
बाजार मेरी साधना का, खोलने अब ये वैभव चला!
नीलामियां मेरी कला की, बोलने क्यूं ये वैभव चला?
अमोल गहरे अर्थ को देखा न जग ने आंख भर कभी!
धन की तुला पर शब्द मेरे तोलने क्यूं ये वैभव चला?          जब भावना के स्वर्ण ने मुझसे गर्दन झुकाने को कहा!
तब पद का सम्मान सब, उस पद को ही लौटा  दिया

डॉक्टर चंडी प्रसाद घिल्डियाल” दैवज्ञ,”

Related Articles

Close