उत्तराखंड

मोदीजी, अबकी बिना बताये अचानक लॉकडाउन न लगा देना

(नरविजय यादव)

कोरोना के ओमिक्रॉन वेरिएंट के डर से अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों को एक बार फिर अनिश्चित काल के लिए रोक दिया गया है। ये 15 दिसंबर से शुरू होनी थीं। इधर व्यापारियों के मन में संशय है कि आगे क्या होगा। व्यापारी चाहता है इस बार सरकार लॉकडाउन न लगाये। साथ ही लोग संगठित होकर काम करें। सरकार जो भी कदम उठाये पहले बता दे। ऐसा न हो कि अचानक से पीएम घोषणा कर दें कि लॉकडाउन लग गया। फिलहाल तो बाजार में अविश्वास बढ़ा है, लोग उधार नहीं दे रहे हैं। दूसरी लहर के समय बहुत लोगों की मौत हो गयी, जिससे सप्लाइर्स और खरीदारों का पैसा फंस गया।

होम टैक्सटाइल एक्सपोर्टर्स वैलफेयर एसोसिएशन (हेवा) के निदेशक, विकास सिंह चौहान कहते हैं कि कोरोना काल में जो लोग ई-मार्केटिंग और ऑनलाइन सिस्टम की ओर नहीं बढ़ पाये, उन्हें बुरी तरह नुकसान हुआ। लेकिन जिन उद्यमियों ने अपने आप को डिजिटल तरीकों से जोड़ लिया और कामकाज को डिजिटल मोड पर ले आये, वे आगे बढ़ रहे हैं। फेस टु फेस मीटिंग की बजाय अब जूम मीटिंग होने लगीं हैं। विदेशी खरीदार पहले भारत आता था, सारी चीजें समझता था, तब जाकर डील करता था। अब वह कहता है कि फोन पर ही सैम्पल दिखा दो। वीडियो कॉल ही काफी कारगर साबित हो रही है। पहले खरीदार का एजेंट यहां आता था, जिससे 4-5 प्रतिशत तक लागत बढ़ जाती थी, अब ऐसा खर्च नहीं होता है। चीजें बहुत फास्ट हो गयी हैं, बिजनेस बढ़ गया है। पिछली दो तिमाही के नतीजे देखें तो पायेंगे कि टैक्सटाइल सेक्टर ने 35 से 40 प्रतिशत वृद्धि हासिल की है। एक्सपोर्ट से तो बड़ी उम्मीदें हैं। ऐसा लग रहा है कि भारत इस बार 400 अरब डॉलर के लक्ष्य को छू लेगा। ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि लोग इंडिया की तरफ आ रहे हैं।

उद्योगों को पहले लॉकडाउन में बहुत नुकसान हुआ। मजदूरों के पलायन से बिगड़े हालात अभी तक नहीं सुधरे हैं। लॉकडाउन से कच्चे माल की मांग व आपूर्ति में असंतुलन पैदा हो गया। पलायन का भूत अभी भी टैक्सटाइल सेक्टर को सहमाए हुए है। परिणामस्वरूप सूत व धागे जैसे कच्चे माल की कीमत 70 प्रतिशत तक बढ़ गयी है। निर्यातकों को न केवल कच्चे माल की कीमतों से, बल्कि शिपिंग की लागत पांच से दस गुना तक बढ़ने से भी कठिनाई हुई। पहली और दूसरी लहर के दौरान माल फंसा रहा, आवाजाही ठप रही, जिससे शिपिंग की लागत बढ़ती गयी। अगर नया वेरिएंट फैलता है तो कई डर हैं।

अगले साल कई बड़े ईवेंट होने हैं, जैसे हेमटेक्स्टिल और डोमोटिक। कपड़ा क्षेत्र में एक्सपोर्ट के बड़े ऑर्डर इन्हीं मेलों से आते हैं। निर्यातकों को अभी भी नहीं पता कि इन मेलों का क्या होगा। निर्यातकों ने पहले ही प्रदर्शनी के लिए मोटी रकम का भुगतान कर दिया है और कई ने अपने सैम्पल भी भेज दिए हैं। खरीदारों ने भी तत्काल डिलीवरी पर जोर देना शुरू कर दिया है। बाजार में दुविधा और डर का माहौल है। खरीदार बड़े और लंबे समय के कांट्रेक्ट करने से हिचकिचा रहे हैं। ऐसे में अगर जीएसटी में वृद्धि हो गयी तो कपड़ा उद्योग पर खास तौर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस तरह के हालात में यदि सभी काउंसिल एक साथ आकर छोटे बुनकरों, डिजाइनरों और एमएसएमई को डिजिटल होने में मदद करें तो अच्छा होगा।

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