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उत्तराखंड की धामी सरकार विवादित फैसले से चर्चा में, सरकारी दौरे पर गये थे सचिव, कैबिनेट मीटिंग में नहीं हो पाये शामिल, छीना गया विभाग

देहरादून, 29 दिसंबर। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनकी सरकार एक अजीबोगरीब फैसले के कारण सवालों के कटघरे में है। धामी सरकार का यह फैसला राज्य के अव्वल दर्जे के अनुशासित, ईमानदार और बेदाग छवि वाले वरिष्ठ आईएएस अफसर विनोद प्रसाद रतूड़ी से जुड़ा हुआ है। धामी सरकार ने कैबिनेट बैठक में एक चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए विनोद प्रसाद रतूड़ी (आईएएस), सचिव, संस्कृत शिक्षा एवं भाषा विभाग, उत्तराखंड शासन (आईएएस) से सचिव, संस्कृत शिक्षा विभाग को वापस ले लिया है। धामी सरकार के इस विवादित और एकतरफा फैसले से उत्तराखंड की ब्यूरोक्रेसी से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों में भी रोष और असुरक्षा की भावना है। धामी सरकार के इस फैसले को लेकर उत्तराखंड की अफसरशाही अभी भले ही मुखर न हुई हो लेकिन कई अधिकारी दबे मुंह सरकार के इस फैसले की निंदा कर रहे हैं।

दरअसल, संस्कृत शिक्षा एवं भाषा विभाग के तत्कालीन सचिव विनोद प्रसाद रतूड़ी का राज्य के सुदूरवर्ती तीन पहाड़ी जनपदों में संस्कृत महाविद्यालयों के निरीक्षण और संबंधित कार्यक्रमों के लिये 24 दिसंबर से देहरादून से सरकारी दौरा शुरू हुआ था। इसके लिये विधिवत प्रोटोकॉल भी जारी किया गया। प्रोटोकॉल के मुताबिक 2 जनवरी तक के इस दौरे के दौरान विनोद प्रसाद रतूड़ी को चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी जनपद के संस्कृत महाविद्यालयों का निरीक्षण करने और कर्णप्रयाग तहसील रतूड़ा गांव में उत्तराखंड के पहले संस्कृत एवं संस्कृति केंद्र के शिलान्यास समेत अन्य कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल होना था।
विनोद प्रसाद रतूड़ी के इसी दौरे के दौरान राजधानी देहरादून में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा 24 दिसंबर को ही कैबिनेट बैठक आहूत की गई, जो देर रात 10 बजे तक चली। कैबिनेट बैठक शुरू होने से पहले ही विनोद प्रसाद रतूड़ी का सरकारी दौरा शुरू हो चुका था। बताया जाता है कि इस कैबिनेट बैठक में संस्कृत शिक्षा से जुड़ा एक प्रस्ताव भी पास होना था। लेकिन अपने तय कार्यक्रम के अनुसार सरकारी दौरे पर देहरादून से पहले ही रवाना हो चुके विनोद प्रसाद रतूड़ी भला इस कैबिनेट बैठक में कैसे शामिल होते?
विनोद प्रसाद रतूड़ी की अनुपस्थिति को लेकर कैबिनेट बैठक में गैरजरूरी नाराजगी जतायी गई। सीएम धामी ने कैबिनेट बैठक में ही कार्मिक सचिव अरविंद ह्यांकी को आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी से संस्कृत शिक्षा की जिम्मेदारी वापस लेने सम्बन्धी आदेश जारी करने का निर्देश दिया। जिसके बाद आनन-फानन में 24 दिसंबर को ही विनोद प्रसाद रतूड़ी को सचिव, संस्कृत शिक्षा के पद से अवमुक्त करने का आदेश जारी कर दिया गया।
आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी को सचिव, संस्कृत शिक्षा के पद से अवमुक्त करने का धामी सरकार का यह फैसला अन्यायपूर्ण और जल्दबाजी में लिया गया एकतरफा फैसला बताया जा रहा है। इसकी बड़ी वजह उत्तराखंड शासन के ही निजि सचिव पुनीत कुमार द्वारा जारी पत्रांक सह प्रोटोकॉल संख्या– 163/निस/स/संशि/2021/24 दिसंबर है, जिसमें मुख्य सचिव समेत सभी संबंधित विभागों के सचिव, जिलाधिकारियों, अधिकारियों को विनोद प्रसाद रतूड़ी के दौरे की जानकारी और संबंधित व्यवस्थाओं के संबंध में निर्देश जारी किया गया। अब सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर विनोद रतूड़ी को अवमुक्त करने से पहले क्या सीएम धामी और उनके कैबिनेट में शामिल अधिकारियों को इस दौरे की जानकारी नहीं थी? यदि नहीं, तो यह सरकार पर और भी बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। यदि हां, तो इसके पीछे आखिर सरकार की क्या मंशा रही है?

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अपने इस दौरे के दौरान ही विनोद प्रसाद रतूड़ी (आईएएस) ने सुदूरवर्ती जनपद चमोली में स्थित उत्तराखंड के तीसरे संस्कृत ग्राम रतूड़ा में राज्य के पहले संस्कृत एवं संस्कृति केंद्र के शिलान्यास और भूमि पूजन कार्यक्रम में भी बतौर सचिव, संस्कृत शिक्षा एवं भाषा विभाग उत्तराखंड शासन के रूप में भी भाग लिया। उनके साथ ही उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति डा. डी. पी. त्रिपाठी, उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा के निदेशक डा. शिव प्रसाद खाली, गिरीश कुमार अवस्थि, सचिव, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी, शिक्षाविद एवं प्रवक्ता शंभू प्रसाद रतूड़ी, सुरेंद्र सिंह, तहसीलदार (कर्णप्रयाग) समेत शासन के जुड़े अन्य अधिकारियों, ग्राम प्रधान नीमा देवी कंडवाल और अन्य गणमान्य लोग भी शामिल रहे थे।
यह भी माना जा रहा है कि विनोद रतूड़ी को सचिव, संस्कृत शिक्षा के रूप में अवमुक्त करने के फैसले पर धामी सरकार अपना होम वर्क ठीक ढंग से नहीं कर पायी। धामी कैबिनेट में शामिल अधिकतर मंत्री आईएएस विनोद रतूड़ी की ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के खुद कायल है। इसका एक ताजा उदाहरण भी गत दिनों देखने को मिला।
दरअसल, जनपद चमोली के कर्णप्रयाग तहसील में स्थित जिस रतूड़ा गांव में दो दिन पहले उत्तराखंड का पहला संस्कृत एवं संस्कृति केंद्र के शिलान्यास किया गया, वहीं कुछ महीनों पहले एक उपक्रम के शिलान्यास के मौके पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ था। उस कार्यक्रम में यह संवाददाता भी उपस्थित था। उस कार्यक्रम में उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत ने आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी की तारीफ में खूब कसीदे पढ़े थे। उन्होंने विनोद प्रसाद रतूड़ी के अनुशासन व ईमानदारी से सभी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से सीख लेने की भी अपील की थी। तब धन सिंह रावत ने कहा था “ऐसे पहली बार देख रहा हूं जब कोई आईएएस अफसर देहरादून-दिल्ली में घर-मकान बनाने के बजाए अपने गांव में आकर बस रहा है और मकान बना रहा है, हमारे यहां तो कोई बाबू बनने पर तहसील को और अधिकारी बनने पर जिले को छोड़कर देहरादून बस जाता है। सचिव साब का अपने गांव में लौटने का प्रयास सबको प्रेरित करने वाला और पलायन करने वालों को आईना दिखाने वाला है”। किसी कैबिनेट मंत्री द्वारा किसी ब्यूरोक्रेट्स की तारीफ का यह उदाहरण विनोद रतूड़ी के व्यक्तिव को दर्शाता है।

उत्तराखंड शासन में ही सचिव पद पर तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अफसर ने से बातचीत में कहा कि आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी ने उत्तराखंड में संस्कृत शिक्षा को जो नये आयाम दिये हैं, उनकी आज राज्य में ही नहीं बल्कि देश भर में प्रशंसा हो रही है। बतौर सचिव, उनकी अगुवाई में संस्कृत शिक्षा के प्रचार-प्रसार के नये तौर-तरीकों और कार्यप्रणालियों को देश के अन्य राज्यों द्वारा भी अपनाया जा रहा है। उनके प्रयासों की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है।

बता दें कि विनोद प्रसाद रतूड़ी की गिनती राज्य और देश के सबसे ईमानदार, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ आईएएस अफसरों के रूप में होती हैं। राज्य के पूरे प्रशासनिक अमले में वे अपनी बेदाग छवि, बेहद सरल स्वभाव, सादगी भरे आचरण, प्रेरक व्यक्तित्व और प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनोद प्रसाद रतूड़ी की आईएएस बनने तक की संघर्ष गाथा नई पीढ़ि और सिविल सेवा में जाने का सपना देखने वाले हर युवा के लिये प्रेरणास्रोत है। बता दें कि विनोद प्रसाद रतूड़ी अविभाजित उत्तर प्रदेश से सिविल सेवा परीक्षा के टॉपर रहे हैं और उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद वे उत्तराखंड कॉडर में आ गये।

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