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सरकार द्वारा रोक लगाने के बावजूद यहां हाथों से मैला साफ करने को मजबूर हैं सफाईकर्मी


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वैसे तो पूरे देश में हाथों से मैला उठाना प्रतिबंधित है. बावजूद इसके कोरबा में एसईसीएल के गेवरा क्षेत्र और कुसमुंडा क्षेत्र के साथ-साथ सीएसईबी और अन्य संस्थानों में भी ठेकेदार सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर ठेका सफाईकर्मियों से हाथों से मैला उठवा रहे हैं. जबकि मैनुअल सीवरेज एक्ट 2013 के तहत हाथों से मैला उठाना प्रतिबंधित किया गया है. हाथों से मैला उठाने को अमानवीय कृत्य की श्रेणी में माना गया है. बावजूद इसके कोरबा में यह काम करवाया जा रहा है.

कोरबा में इस अमानवीय प्रथा को आज भी सफाईकर्मी ढो रहे हैं. कोयला खदानों की अनुशांगीक एसईसीएल गेवरा क्षेत्र में यह नजारा देखने को मिला, जहां सीवेज चेंबरों में उतरकर ठेका सफाईकर्मीं हाथों से मैला साफ कर रहे हैं. ठेकेदार ने ना तो इन्हें गम बूट दिये हैं और ना ही दस्ताने. सुरक्षा उपकरणों के नाम से इन सफाईकर्मीयों के पास कुछ भी नही है. बावजूद इसके परिवार का पालन-पोषण करने के लिए उन्हे यह काम करना पड़ रहा है. जब इन सफाईकर्मीयों से बात की गई तो उन्होंने बताया की उनके ठेकेदार रिंकु शर्मा द्वारा उन्हें कोई भी सुरक्षा उपकरण प्रदान नहीं किया जाता है और जब मांग की जाती है, तो धमकाया जाता है की काम करना है तो करो. सफाईकर्मी रामप्रसाद ने यह भी बताया की उन्हें पारिश्रमिक के रूप मे प्रतिदिन के हिसाब से महज 166 रुपये है दिये जा रहे हैं.

वैसे तो भारत में मैला ढोने की प्रथा भारत की विकास प्रक्रिया के चेहरे पर एक गहरा काला धब्बा है. आजादी के 7 दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी ये राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि 21 वीं सदी में साफ-सफाई में लगे हजारों परिवार सामाजिक तौर पर अपमानित और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जीवन भर समाज के इस हिस्से के काम करने और उसके जीने की स्थितियों में सुधार के लिए संघर्ष करते रहे. उसकी खोई गरिमा को वापस दिलाना गांधी जी के प्राथमिक एजेंडे का हिस्सा था. उनका मानना था की किसी मनुष्य द्वारा त्याग किए गए मलमूत्र की साफ-सफाई के लिए व्यक्ति विशेष को नियुक्त करने की व्यवस्था सर्वथा अमानवीय है और इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए महात्मा गांधी समेत तमाम महापुरुषों ने समय-समय पर प्रयास किए. फिर भी यह व्यवस्था न सिर्फ निजी बल्कि सरकारी प्रतिष्ठानों में भी अपनी जड़ें जमाए हुई है

जब सफाईकर्मीयों की समस्या को लेकर गेवरा परियोजना के सिविल विभाग के उप महाप्रबंधक, ठेकेदार और सुपरवाइजर से बात की तो सभी ने यह कहकर पल्ला झाड़ते हुए कहा कि सफाईकर्मीयों को सुरक्षा उपकरण दिये गये हैं, लेकिन वे अपनी मर्जी से नहीं पहनते. ठेकेदार रिंकु शर्मा ने तो मीडिया से बात करते वक्त सारी हद पार करते हुए यह तक कह दिया की काम करनेवाले सफाईकर्मी उनके नहीं हैं.

कुसमुंडा में भी सफाईकर्मी कालोनी के सीवेज चेंबर मे उतरकर मल मुत्रों को साफ कर रहे थे. जब उनसे बात की गई तो उनका दर्द आंखो से छलक आया और उन्होंने बताया की मशीन मंगाने की बात करते हैं फिर भी अधिकारी और ठेकेदार हेमंत बरेठ इस काम को हाथों से ही करने मजबूर कर रहे हैं और अगर मना किया जाए तो पैसा काटने की धमकी देते हैं.

राष्ट्रीय सफाई मजदूर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सिकंदर उसरवर्षा और जिला निगरानी समिति के सदस्य रामस्वरूप चौधरी ने सफाईकर्मीयों की दयनीय स्थिति का बयान करते हुए कहा, कि प्रशासन की अनदेखी की वजह से आज भी सफाई कर्मी मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाए हैं. रामस्वरूप चौधरी का कहना है कि जिले में करीब 90 सफाई कर्मी ऐसे हैं जो हाथ से मैला साफ करते हैं. बावजूद इसके नगर निगम जब सूची जारी करती है तो उनके द्वारा यह दर्शाया जाता है कि जिले में कोई भी हाथ से मैला साफ करने वाले सफाई कर्मी नहीं है. राष्ट्रीय सफाई मजदूर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष ने प्रशासन को दोषी ठहराते हुए कहा कि जिले में यह सभी कार्य प्रशासन की जानकारी में हो रहा है, फिर भी प्रशासन कोई भी कदम नहीं उठा रहा है.

आपको बता दें कि जिला निगरानी समिति की अध्यक्ष जिला कलेक्टर है, उनकी अनुपस्थिति में जिला निगरानी समिति की बैठक आदिवासी विभाग के सहायक आयुक्त एन.के. दीक्षित ने ली थी. उन्होंने बताया कि मीटिंग में विभागों और ठेकेदारों द्वारा सभी सुरक्षा उपकरण सफाई कर्मियों को देने की बात कही जाती है.

आगे सहायक आयुक्त ने बताया कि जो ठेकेदार पिछले बैठक में नहीं आए थे उन्हें नोटिस जारी कर दिया गया है. जो हमारे अधिकार में है उसके तहत एक्शन लिया जाएगा. श्रम आयुक्त के जवाब से ये साफ पता चलता है कि अधिकारियों और ठेकेदारों की बातों में आकर निगरानी समिति इस बात का ध्यान नहीं रखती है कि वास्तव में सफाई कर्मियों को सुरक्षा उपकरण प्रदान किए गए हैं या नहीं.

गौरतलब है कि केंद्र में बनी नई सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 से पांच वर्षों के लिए स्वच्छ भारत अभियान की पहल की थी. सरकार चाहती है कि इसमें सभी लोग पूरी लगन और निष्ठा से शामिल हों, लेकिन इससे ज्याद मैला ढोने की सदियों पुरानी अमानवीय और अपमानजनक प्रथा को खत्म करना जरूरी है.

मौजूदा कानून को पूरी सख्ती से लागू करने से लेकर जरूरत पड़ने पर उसमें उचित बदलाव किया जा सकता है. साथ ही बुनियादी ढांचे से जुड़ी हर जरूरत को मुहैया कराया जाना सरकार की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए. स्वच्छ भारत अभियान को केवल सफाई के मुद्दों से जोड़ने की जगह मानव की गरिमा पर केंद्रित किया जाना चाहिए. पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान के जरिए साफ-सफाई पर जोर-शोर से चर्चा हो रही है, जरूरी है कि इस अमानवीय पेशे के उन्मूलन के लिए भी गंभीर प्रयास किए जाएं.


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