नई दिल्ली

अदालत में अभिव्यक्ति… सबसे बड़े गणतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार और पांच चुनौतियां


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देश 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। सात दशक पहले आज ही के दिन संविधान लागू हुआ था और भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में उदय हुआ। संविधान ने नागरिकों को आजाद जीवन जीने के तमाम मौलिक अधिकार दिए। इन्हीं में से एक अहम अधिकार है-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। संविधान ने इसके तहत नागरिकों को मर्यादा के साथ बोलने, लिखने या कहने की स्वतंत्रता दी थी, लेकिन आज देश में एक शोर है कि संविधान की मूल भावना पर कुठाराघात किया जा रहा है।

हालांकि यह आरोप लगाने वाले खुद अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की मूल भावना को आत्मसात नहीं कर रहे। इस अधिकार में आजादी है तो एक बंधन और सीमा भी है और दोनों ही आवश्यक हैं। जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैसे ही सहमति और असहमति, दोनों लोकतंत्र के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। समझना होगा कि संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है न कि स्वच्छंदता का।

स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में बेहद बारीक अंतर होता है, लेकिन इस अंतर में गहरी खाई भी है। स्वतंत्रता का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाता है जबकि स्वच्छंदता दूसरों की सुविधा या असुविधा नहीं देखती। अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का कथन उपयुक्त है-‘जो लोग दूसरों की आजादी बाधित करते हैं, वे स्वयं उस आजादी के हकदार नहीं हैं।’ भारत में करीब डेढ़ माह में ऐसा ही कुछ देखने को मिला।

जहां राज्यों में हिंसक प्रदर्शनों, नेटबंदी या धारा-144 लगने के दरमियान अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल व दुरुपयोग और उस पर सरकारी कार्रवाई बहस के केंद्र में रही। इसी दौरान इस अधिकार का दायरा भी विस्तृत हुआ, जब कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी मामले की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इसे अनुच्छेद 19 से जोड़ा। बहरहाल, अधिकारों की आड़ में नागरिकों के कर्तव्य पथ से भटकने और सरकार पर दमन के आरोपों के बीच इस गणतंत्र दिवस पर यह सवाल मौजूं है कि संविधान से मिली अभिव्यक्ति की आजादी के सही मायने क्या हैं और उसका दुरुपयोग कैसे रुके?


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