शिक्षा

विश्व शिक्षक दिवस पर शिक्षक नरेन्द्र खुराना ने सभी शिक्षको को समर्पित की स्वरचित कविता

ऋषिकेश 05 अक्टूबर। विश्वभर में प्रतिवर्ष 5 अक्टूबर को शिक्षकों, शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों को उपलब्धियों, कार्यों और योगदान हेतु सम्मानित करने के लिए विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
विश्व शिक्षक दिवस पर अध्यापक नरेन्द्र खुराना ने स्वरचित कविता सभी शिक्षकों को समर्पित की।
जाने अनजाने प्रश्नों का में सटीक जवाब बन जाता हूं, अपने अनोखे तरीकों से बस में लाजवाब बन जाता हूं। चौक डस्टर से खेलते-खेलते मृदंग सा हो जाता हूं, लाल स्याही के रंग में घुलकर गुलाल सा हो जाता हूं। थकता नहीं हूं मैं कभी-कभी तो घड़ी से आगे निकल जाता हूं। सूरज 5 बजे उठता है मैं 4 बजे उठ जाता हूं, कभी आईने में देखकर बेवजह मुस्कुराता हूं। वही अपनी पुरानी गाड़ी देखकर सबसे नजर चुराता हूं, पुराने रजिस्टर पर मेरे आड़े टेढ़े हस्ताक्षर कभी-कभी स्कूल लेट हो जाने पर नया सा मुंह बनाता हूं। कभी अपनी एक आवाज पर सब को शांत कराता हूं, कभी उन्हीं संग बैठ कर खूब ठाके लगाता हूं। हां मैं शिक्षक हूं ऐसे ही समझ आता हूं। घंटों खड़े रहने की मुश्किल किसी से ना कह पाता हूं। एक ही किताब सालों तक पढ़ कर उनके प्रश्नों को रट जाता हूं, ढेर कॉपियों का देखकर दिल को हाथ लगाता हूं। रोशनी का हाल ना मिले तो बेचैन सा हो जाता हूं, सिर्फ पढ़ना ही जिंदगी नहीं है बस ऐसे ही सब कुछ मैं कर जाता हूं। स्कूल के कार्यक्रम की कवरेज कर-कर कलाकार सा बन जाता हूं, गलतियां निकालने की ऐसी बुरी लत लगी है के घर आए शादी के कार्ड में भी गोले बनाता हूं, हां मैं शिक्षक हूं ऐसे ही समझ आता हूं। बीमार होने का हक नहीं है मुझे आधी बीमारी में खुद ही ठीक कर जाता हूं, गृहस्थ जीवन छोड़कर रोज तपस्या करने जाता हूं। अपनी छोटी जरूरतों के लिए मान सम्मान कमाने जाता हूं, बच्चों को दिल लगाकर पढ़ाता हूं। अच्छे नंबर के लिए उनमें प्रोत्साहन बढ़ाता हूं, करता हूं आशा सबसे सबको मिले समाज में मान सम्मान, इसीलिए पढ़ाते वक्त इतना खो जाता हूं। हां मैं शिक्षक हूं ऐसे ही समझ आता हूं। माना पैसे जरूरत है मेरी इसलिए कमाने जाता हूं, पर गर्व है इस बात पर कितने भविष्य बनाने जाता हूँ। कच्ची मिट्टी पर हल्के हाथ से नए आकार बनाता हूं, हर साल नए बीजों के साथ नई फसल उगाता हूं। पर गर्व है इस बात पर मै भविष्य बनाने जाता हूँ। बता दो कोई एक ऐसा पेशा जो नैतिक मूल्य सिखाता हो, बच्चों को सिखाते सिखाते खुद सुधर जाता हूं। हा मैं शिक्षक हूं ऐसे ही समझ आता हूं। समय के साथ परिवर्तन होते चले गए नया पाठ्यक्रम भी आता गया, उनमें भी कुछ परिवर्तन के साथ चलना चाहता हूं। हो जाती हैं गलतियां मुझसे भी अनेक किसी से ना कह पाता हूं, अपने अंदर ही अंदर खुद को समेटे पाता हूं। हां मैं शिक्षक हू, ऐसे ही समझ आता हूँ। अब आ रही राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार चलने का प्रयास करना चाहता हूं। हां मैं शिक्षक हूं, ऐसे ही समझ आता हूं। मान सम्मान में आपका आशीर्वाद पाने के लिए अनेकों अपने से जो बन पाते हैं कार्यक्रम में सहभागिता निभाता हूं। गुरुओं का आशीर्वाद आप की शुभकामनाएं निरंतर मिलती है, इसीलिए मैं इतना कुछ लिख पाता हूँ। हा मैं शिक्षक हूं ऐसे ही समझ आता हूं।

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