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ऑल वेदर रोडः विकास या विनाश? हो रही मानकों की अनदेखी

लाखों-करोड़ों का मुआवजा बांटने के बाद भी कब्जा बरकरार

एनएच अभियंताओं और कर्मचारियों की मिली भगत ने परियोजना को बनाया सफेद हाथी 

देहरादून। चारधाम यात्रा को सुगम बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘ऑल वेदर रोड’ परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। वर्ष 2016-17 में प्रारंभ हुई इस राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना का मकसद था कि चारधाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को बेहतर सड़क संपर्क से जोड़ना, यात्रा को सुरक्षित बनाना और सामरिक दृष्टि से सीमावर्ती क्षेत्रों में पहुंच आसान करना।
करीब 12 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का बताते हुए आगे बढ़ाया था। हालांकि समय के साथ इस पर पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी, मुआवजा वितरण में अनियमितता और अवैध निर्माण को संरक्षण देने जैसे गंभीर आरोप लगने लगे हैं। पर्यावरणविदों का आरोप है कि परियोजना को 100 किमी से कम लंबाई वाले 53 हिस्सों में विभाजित किया गया, जिससे समग्र पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन से बचा जा सके। मामला अदालत तक पहुंचा और 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर तक सीमित रखने का निर्देश दिया था। बाद में 2021 में रक्षा जरूरतों का हवाला देते हुए इसे 10-12 मीटर तक बढ़ाने की अनुमति दी गई। 2025 में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी और करण सिंह सहित 50 से अधिक नागरिकों ने चौड़ीकरण के फैसले की समीक्षा की मांग की। उनका कहना था कि इससे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर क्षति पहुंची है और सैकड़ों नए भूस्खलन जोन बन गए हैं।
अध्ययनों के अनुसार, परियोजना के दौरान हजारों पेड़ों की कटाई, सैकड़ों हेक्टेयर वनभूमि की सफाई और भारी मात्रा में मलबा डंपिंग की गई, जो वर्षा के दौरान नदियों में बहकर बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ा रही हैं। नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पर्यावरणविद विशेषज्ञ देवराघवेन्द्र बद्री का कहना है कि न्यायालयों ने फ्लडप्लेन क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और सुप्रीम कोर्ट ने नदी तटों पर निर्माण को नियंत्रित करने के आदेश दिए थे। वहीं उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी 2018 में रिवरबैंक पर निर्माण और मलबा डंपिंग के विरुद्ध सख्ती बरतने को कहा था। इसके बावजूद कुछ स्थानों पर होटल, दुकानें और अन्य व्यावसायिक निर्माण नदी किनारों के समीप जारी रहने की शिकायतें मिल रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फ्लडप्लेन क्षेत्रों में अतिक्रमण नहीं रोका गया तो भविष्य में गंभीर आपदाएं सामने आ सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है। अंधाधुंध कटान, ढलानों की अस्थिरता और मलबा प्रबंधन में लापरवाही भविष्य में भूस्खलन और बाढ़ की घटनाओं को बढ़ा सकती है। 2013 की केदारनाथ आपदा का उदाहरण देते हुए पर्यावरण कार्यकर्ता चेतावनी दे रहे हैं कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन आवश्यक है।
एनएच विभाग के अधिशासी अभियंता ओंकार पाण्डे ने कहा कि एनएच चौड़ीकरण को लेकर कार्यवाही लगातार जारी है। जिन स्थानों पर मुआवजा बंटने के बाद भी अतिक्रमण किया जा रहा है, उन स्थानों पर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए हैं। कई बार नोटिस भी भेजे गए हैं, जबकि लोगों की भी शिकायतें मिली हैं। मानकों के तहत रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड नेशनल हाईवे पर कार्य चल रहा है। 
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करेगा, या फिर परियोजना विवादों के साये में ही आगे बढ़ती रहेगी। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में संतुलित विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य ही भविष्य की स्थिरता की कुंजी माना जा रहा है।
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सरकार का लाखों करोड़ों का मुआवजा बांटा,, फिर होने दिया अवैध निर्माण,
देहरादून। रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे चौड़ीकरण से प्रभावित भवन स्वामियों और भूमिधरों को मुआवजा वितरित किया गया, लेकिन स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि राजनीतिक प्रभाव वाले लोगों को अनुपात से अधिक मुआवजा दिया गया। कुछ मामलों में पूरे भवन का मुआवजा स्वीकृत होने के बावजूद ढांचों को पूरी तरह नहीं हटाया गया है। यह स्थिति हाईवे के तिलवाड़ा में देखने को मिल रही है। यहां नेशनल हाईवे चौड़ीकरण में अभियंता और कर्मचारियों की मिलीभगत से मुआवजे की बंदरबांट की जा रही है। परिणामस्वरूप, उन्हीं भूखंडों पर दोबारा निर्माण और अतिक्रमण बढ़ने की शिकायतें सामने आई हैं। तिलवाड़ा में सरकार ने लाखों-करोड़ों का मुआवजा बांटा, मगर एनएच विभाग के अभियंता और कर्मचारियों की कारस्तानी से अतिक्रमण नहीं हटाया गया। इसमें जिला प्रशासन और तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली में सवालों के घेरे में है। जिससे साफ है कि एनएच विभाग के अभियंता, कर्मचारियों ने सरकारी धन की बंदरबांट की।  व्यस्त बाजार क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्ग मानकों के अनुरूप चौड़ाई और सुरक्षा प्रावधान लागू नहीं किए जाने से यातायात दबाव और दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ी है। 

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