उत्तराखंडन्यायालय

उत्तराखंड के जेलों में आजीवन सजा काट चुके कैदियों की रिहाई पर सुनवाई

हाईकोर्ट ने पूछा रिहा करने के लिए क्या पॉलिसी बनाई गई

नैनीताल। उत्तराखंड की जेलों में आजीवन सजा काट चुके कैदियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी रिहा नहीं करने के मामले पर नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद सोमवार को न्यायाधीश रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने राज्य सरकार से पूछा है कि एक हफ्ते के भीतर कोर्ट को बताएं कि इन्हें रिहा करने के लिए क्या पालिसी बनाई गई है? कोर्ट को अवगत कराएं। अब मामले की अगली सुनवाई 18 मई को होगी।
 आज यानी 11 मई को राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि पूर्व के आदेश पर कई कैदियों को जेल प्रशासन ने रिहा कर दिया है। जबकि, कई संगीन अपराध में लिप्त अपराधियों को नहीं छोड़ा गया और कुछ अपराधी ऐसे हैं, जिनको छोड़ने के लिए राज्य सरकार की और अनुमति लेनी आवश्यक है।
 कैदियों की तरफ से कहा गया कि उनकी सजा कब की पूरी हो चुकी है, लेकिन सुप्रीम और हाईकोर्ट के आदेश होने के बाद भी उन्हें जेल से रिहा नहीं किया जा रहा है। यह कोर्ट के आदेश की अवहेलना है। उनकी ओर से कई बार उन्हें रिहा करने को लेकर जेल प्रशासन को पत्र भी दिए गए, लेकिन उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया। यह उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
दरअसल, कैदियों की तरफ से उन्हें रिहा करने को लेकर अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाओं में कहा गया कि उनकी सजा पूरी हो चुकी है, फिर भी उन्हें रिहा नहीं किया जा रहा है। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट को निर्देश देकर कहा था कि इस आदेश का अनुपालन करवाया जाए। साथ में ये भी कहा था कि जिन कैदियों की सजा पूरी हो चुकी है, उन्हें रिहा करने के आदेश दिए जाएं।
पूर्व में नैनीताल हाईकोर्ट ने आदेश का अनुपालन नहीं करने पर इस मामले की स्वतः संज्ञान लिया। साथ में जेलों का दौरा भी किया। जिसमें उनको 167 ऐसे कैदी जेलों में मिले, जिनकी सजा पूरी हो चुकी थी। कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण उनको रिहा नहीं किया गया। कोर्ट के दखल के बाद सरकार ने कुछ कैदियों को तो रिहा किया, लेकिन संदिग्ध कैदियों को रिहा नहीं किया गया।

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